Rashi Saxena
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27/01/2020 | 01:44: PM
साहित्य खज़ाना / कविता | 19

इस देश का हूं लाल मैं


 इस देश का हूं लाल मैं....

जन्म यहां पर पाया है
न हो मां को अफसोस मेरी
तभी शरीर ये भिजवाया है....

चाहता हूं अब 
टूटे आस मेरे आने की....
जलना तुम एक ओर लौ
दुश्मन को ख़ाक बनाने की....

मरा नहीं हुआ हूं अमर मै...
बस तुम्हें तसल्ली करानी थी
अपनी माटी की खातिर मुझे
हर जन्म देनी कुर्बानी थी....

न रो अब हो जा खुश
तेरे लाल ने तेरा सर उठाया है...
तो क्या हुआ जो तूने अपना
 ये लाल गवाया है...

मां मैं तेरा लाल हूं
पर इस माटी का मैं रखवाला था...
मर गया तो क्या 
कितनों को मार गिराया था...
माटी का था क़र्ज़ मुझपे कुछ
मैने तो वो क़र्ज़ चुकाया है.....

मां, मेरी अर्धांगिनी को बना 
अब बलवान तू....
लाल गया तो क्या? 
उसको सिखा अब बलिदान तू...
तोड़के 
उसके हाथों की ये बेड़ियां
उसके सपनों को लगा 
अब पंख तू....

उसके सिंदूर का रंग
अभी उजाला है
ये पैगाम कागज़ पे 
मैने उतारा है....
माटी का क़र्ज़ था मुझपे कुछ
मैने वो क़र्ज़ चुकाया है
मां मैने वो क़र्ज़ उतारा है....




     
     ..राशि सक्सैना..



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