Rashi Saxena
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20/02/2020 | 01:02: PM
सोशल / सामाजिक | 72

ग़रीबों के लिए मुश्किल होंगी ज़मानत की नई शर्तें

New conditions of bail will be difficult for the poor


’अब तो जेल में जाना पड़ेगा, जाना पड़ेगा. जेल की चक्की पीसनी पड़ेगी, पीसनी पड़ेगी ’

उत्तर भारत के कई इलाक़ों में बच्चों के खेल-खेल में गाए जाने वाले इस गीत की ये पंक्तियां शायद जीवन, आज़ादी और हिरासत के प्रति अपराधिक न्याय प्रणाली के दृष्टिकोण को आम जनमानस में जिस तरह समझा गया है उसे दर्शाती हैं, जिस तरह मुहावरों और लोकोक्तियों कई बार छन-छन कर आए ज्ञान को दर्शाते हैं, ये पंक्तियां भी भारतीय क़ानून की ज़मीनी सच्चाई से बहुत दूर नहीं हैं।



जब क़ानून को व्यवहार में लाने की बात हो तो, किसी भी सभ्य समाज की न्यायिक प्रणाली के केंद्र में रहने वाले ’बेगुनाही के सिद्धांत’ की भारत में बहुत स्वीकार्यता नहीं है। जुलाई 2010 में बंबई हाईकोर्ट के द्वारा एक अधिसूचना के ज़रिए ज़मानत और अग्रिम ज़मानत पर लगाई गईं सख़्त शर्तें इसका एक उदाहरण हैं।

सौभाग्य से, दिसंबर 2010 में हाई कोर्ट की एक डिवीज़न बैंच ने अधिवक्ता अंजली वाघमारे की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इन शर्तों पर रोक लगा दी थी। बंबई हाई कोर्ट की एक डिवीज़न बैंच ने 29 जनवरी 2020 को इस याचिका को ख़ारिज कर दिया और अधिसूचना पर लगा स्टे रद्द हो गया, जिसकी वजह से ज़मानत पर लगी वो सख़्त शर्तें फिर से लागू हो गई हैं।


ज़मानत की ये शर्त कि अभियुक्त को तीन सगे संबंधियों का नाम, पता और रोज़गार की पूरी जानकारी दस्तावेज़ों और सबूतों के साथ देनी होगी, बहुत से ग़रीब क़ैदियों के लिए जेल सुनिश्चित कर देगी। ऐसे देश में जहां की शहरी मध्यमवर्ग और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह जैसे लोगों के पास भी स्पष्ट दस्तावेज़ न हों, शहरी और ग्रामीण ग़रीबों की हालत को समझा ही जा सकता है। ये कल्पना की जा सकती है कि उनके पास निवास, नागरिकता और रोज़गार से जुड़े दस्तावेज़ होंगे या नहीं।


ऐसा देश जिसमें बेरोज़गारी और काम की वजह से बड़ी आबादी को पलायन करना पड़ता है, ज़मानत की पुलिस और अदालत को बदले हुए पते के बारे में जानकारी देने की शर्त क़हर बरपा सकती है. ऐसे में चार्जशीट दायर होने तक हर सप्ताह पुलिस और हर महीने अदालत में हाज़िरी देने और चार्जशीट दायर होने के बाद तीन महीने में एक बार हाज़िरी की शर्त काम के लिए प्रवास करने वालों के लिए पूरी करना मुश्किल हो सकता है



ऐसे में, इसका नतीजा ये होगा कि पुलिस संबंधित व्यक्ति को भगोड़ा घोषित कर देगी या अदालत में पेश न होने के कारण उसे समन जारी हो जाएंगेऐसे व्यक्ति के लिए दोबारा गिरफ्तारी पर ज़मानत पर रिहा होना और मुश्किल हो जाएगा क्योंकि ये अधिसूचना ज़मानत पर रिहा होने के विशेष कारणों को रिकॉर्ड करना अनिवार्य करती है और पुलिस को जानकारी देने के बारे में और सख़्त शर्तें लगाती है

अभियुक्त के लिए पॉसपोर्ट, तस्वीर सहित क्रेडिट कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, राशन कार्ड, बिजली बिल, लैंडलाइन टेलीफ़ोन बिल और प्रापर्टी रजिस्टर जैसे दस्तावेज़ पेश करना अनिवार्य करने से बहुत से लोग ज़मानत पर रिहा होने से वंचित रह जाएंगे


और दस्तावेज़ों में दर्ज पते को पुलिस से सत्यापित कराने की शर्त पुलिस विभाग में पहले से व्याप्त भ्रष्टाचार को और बढ़ा देगी. अदालत में पुलिस की ही रिपोर्ट लगेगी. ये आम राय है कि सभी दस्तावेज़ होने पर भी पासपोर्ट के सत्यापन के लिए आने वाले पुलिसकर्मी रिश्वत ले ही लेते हैं



बंबई हाई कोर्ट की ओर से लगाई जाने वाली ये सख़्त शर्तें मौजूदा हालात को और ख़राब करेंगी और ग़रीबों के प्रति भेदभावपूर्ण होंगी। हाई कोर्ट को अग्रिम ज़मनत के संबंध में 29 जनवरी 2020 को दिए गए सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक बैंच के फ़ैसले से सीख लेनी चाहिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “निष्कर्ष में, हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि नागरिकों के अधिकार मौलिक हैं, प्रतिबंध मौलिक नहीं है “



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