Rashi Saxena
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30/12/2019 | 11:38: AM
साहित्य खज़ाना / कविता | 309

अब हो गई इंतहा


अब हो गई इंतहा....

रुक जाओ ऐ ज़ालिमों
क्या अब एक और नारी जलाओगे ।।

रूह नहीं कांपती क्या तुम्हारी
तुम फिर हैवानियत दिखाओगे ।।

क्या था उस बेटी का कसूर 
कपड़ा, रूप या रंग
अब किसको गलत बताओगे ।।

मान गए है अब हम भी 
के बाज़ तुम न आओगे

यू हीं तुम सबको 
शर्मसार कर जाओगे ।।

कौन है जो 
तुम्हारी सीमाएं तुम्हे बताएगा

सच हो जाए ये सपना 
तो हर चेहरा खिल जाएगा ।।

इंतज़ार है मुझे उस दिन का 
जब रातों-रात कोई हैवान 

सूली चढ़ जाएगा
उस दिन सच में 

देश का गौरव बढ़ जाएगा ।।


    


 ...राशि सक्सेना...



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