Rashi Saxena
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24/01/2020 | 11:50: AM
साहित्य खज़ाना / कविता | 48

देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं


...देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं...

इतने दर्द के बाद भी मुस्कुरा रहा हूं
तेरी तकलीफों को कैसे मैं हराया जा रहा हूं...
तकलीफों को हराकर जीना तो आदत सी है मेरी 
पर कई सवालों में मैं घिरा जा रहा हूं
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं...

दर दर भटका अब रुका जा रहा हूं
हर मोड़ को ही अपना मैं कहा जा रहा हूं
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं...

आंखों में छिपे हैं ख्वाब कई
ख्वाब नहीं, हैं ये राज़ कई
ख्वाबों के शिखर से घिरा जा रहा हूं...
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं...

यूं तो कुछ अधूरी सी हैं खुशियां मेरी
मुकम्मल करने उन्हें, मैं जिया जा रहा हूं
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं...

औरों से नहीं खुद से खफा हूं मैं तो
बेवजह औरों से नहीं खुद से लड़ा जा रहा हूं
शिकवे गिले मैं किया जा रहा हूं
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं...

लादकर उम्मीदों का बोझ कांधे पर अपने
तेरी इन राहों में बढ़ा जा रहा हूं
उम्मीदें ये कभी ख़त्म होगी नहीं
फिर भी उम्मीद मैं किया जा रहा हूं
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं...

न जीने की वजह कई हैं पास मेरे
मैं तो बस जीने की वजह जिया जा रहा हूं
हर सज़ा को वजह मैं कहा जा रहा हूं
देख ज़िन्दगी दर्द में भी मैं हंसा जा रहा हूं...

                                                              ...राशि सक्सैना



       
         ...राशि सक्सैना



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