Mahak Vishnoi
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09/02/2020 | 01:34: PM
धार्मिक / धार्मिक | 44

अद्भुत यहां विभीषण ने किया था भगवान गणेश पर वार, दिखता है चोट का निशान

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भारत विविधताओं और आश्चर्यों का देश है, यहां के धार्मिक रीति-रिवाज और परंपराएं हमेशा से ही चर्चा का विषय रहे हैं। चूंकि भारत सांस्कृतिक रूप से एक समृद्ध देश है इसलिए यहां धार्मिक स्थलों की प्रचुरता है। गहराई से नजर डालें तो पता चलता है कि अधिकतर भारतीय मंदिरों का किसी न किसी रूप में पौराणिक काल संबध रहा है। इन धार्मिक स्थानों का भ्रमण न सिर्फ आपकी आस्था को दृढ करता है, बल्कि प्राचीन भारत के इतिहास को भी सामने लाकर रखता है। चाहें बात उत्तर भारत की करें यहां दक्षिण की, आस्था की एक मजबूत डोर आपको यहां चारो दिशाओं में मिलेगी।
आज इस खास लेख में हम दक्षिण भारत के एक ऐसी प्राचीन मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो धार्मिक और भौगोलिक रूप से ज्यादा महत्व रखता है बल्कि इससे जुड़ी पौराणिक किवदंतियां आपको कुछ पर के लिए सोच में डाल सकती है। तो आइए जानते हैं इस अद्भुत मंदिर के बारे में।

                                                                                                                                                       

उच्ची पिल्लयार मंदिर
तमिलनाडु के त्रिची में स्थित उच्ची पिल्लयार मंदिर भगवान गणेश को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है, जिसका संबंध 7वी शताब्दी से बताया जाता है। यह मंदिर त्रिची के एक रॉक फोर्ट पर स्थित है। यह प्राचीन मंदिर 273 फुट की ऊंचाई पर बसा है, जहां तक पहुंचने के लिए 400 सिढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है। पौराणिक साक्ष्य बताते हैं कि यह वो स्थान है जो भगवान गणेश और रावण के भाई विभिषण से जुड़ी एक हैरान कर देने वाली घटना से संबंध रखता है। आगे जानते हैं इस मंदिर से जुड़े अन्य दिलचस्प तथ्यों के बारे में।

मंदिर की वास्तुकला
चूंकि यह मंदिर 83मीटर ऊंचे विशाल पत्थर पर बसा है इसलिए इसे रॉक फोर्ट मंदिर भी कहा जाता है। माना जाता है कि इस पत्थर को काटना सबसे पहले पल्लवों ने शुरू किया था, लेकिन विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत मदुरई के नायकों ने इस मंदिर को पूर्ण किया। यह एक अद्बुत मंदिर है, जिसकी रॉक कट वास्तुकला पर्यटकों को काफी हद तक प्रभावित करती है। चूंकि यह एक प्रचानी विरासत है इसलिए यह भारतीय पुरातात्विक विभाग के अंतर्गत सुरक्षित है। इस रॉक फोर्ट टेंपल से आप पूरे शहर का दीदार कर सकते हैं। खासर रात के समय जगमगाता शहर काफी खूबसूरत लगता है।

                                                                                                                              
                                                                               
मंदिर से जुड़ी पौराणिक किवदंती 
 इस मंदिर से एक पौराणिक किवदंती भी जुड़ी है, माना जाता है कि रावध वध के बाद प्रभु श्रीराम ने रावण के भाई विभीषण को रंगनाथ की एक मूर्ति दी थी। रंगनाथ भगवान विष्णु का ही एक रूप हैं। यह सब जानते हैं रावण और विभीषण के विचार एक दूसरे से मेल नहीं खाते थे। और रावण की वध करने में विभीषण ने भगवान राम का साथ दिया था। जिस वक्त विभीषण को भगवान रंगनाथ की प्रतिमा दी गई, तो देवलोक के सभी देवताओं ने इससे निराशा जताई। वे सभी भगवान गणेश के पास गए और उनके प्रार्थना की कि वे ऐसा होने से रोके। उस प्रतिमा को लेकर यह तथ्य यह भी था कि वो जहां पहली बार रखी जाएगी वहीं स्थापित हो जाएगी। माना जाता है कि रावण का भाई विभीषण जब भगवान रंगनाथ की मूर्ति लेकर त्रिची पहुंचा तो उनका मन कावेरी नदी में स्नान करने का हुआ। चूंकि उन्हें प्रतिमा लंबा ले जानी थी, और वे उसे कहीं ओर रख नहीं सकते थे, तो वे किसी को ढूंढने लगे। तभी उस स्थान पर एक चरवाहे बालक के रूप में भगवान गणेश का आगमन हुआ। विभीषण ने वो मूर्ति उस बालक के हाथ में थमा दी और कहा कि इसे जमीन पर न रखना। लेकिन जैसे ही विभीषण स्नान के लिए कावेरी नदी में उतरा, भगवान गणेश ने वो प्रतिमा जमीन पर रख दी। यह देख विभीषण क्रोधित हो गया, और उस बालक के गुस्से से दौड़ा। विभीषण को आते देख भगवान गणेश वहां से भागकर एक पहाड़ी चोटी पर जा बैठे। आगे रास्ता नहीं था इसलिए बालक को वहीं रूकना पड़ा। इस दौरान विभीषण ने बालक से सिर पर वार कर दिया। जिसके बाद भगवान गणेश अपने असल रूप में आ गए। विभीषण ने यह देख भगवान से अपनी गलती के लिए माफी मांगी। तब से भगवान गणेश इस पहाड़ी चोटी पर विराजमान हैं। भगवान गणेश की प्रतिमा पर आज भी चोट के निशान देखे जा सकते हैं।



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