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09/12/2019 | 01:30: PM
साहित्य खज़ाना / कविता | 279

ये कैसी खामोशी है इन हवाओं में


ये कैसी खामोशी है इन हवाओं में
क्या कुछ खो जाने का डर है आज इस दिल में 
तन्हाईयां तो हमेशा साथ थी 
फिर क्यों उदासी छाई है इस चेहरे में
किसका इंतज़ार है आज मुझे 
उसका जिसके आने की कोई उम्मीद नहीं 
या 
जिसके होने पर भी वो मेरा नहीं 
एहसास बहुत है ....उम्मीदे अनेक
लेकिन इनमे से कुछ हासिल हो 
उसकी कोई नहीं है उम्मीद 
कैसी कशमकश है ?
चाहत भी है और चाह भी 
बस कुछ नहीं तो ,
तेरे वापिस लौटने की उम्मीद 
मेरी खामोशियां बातें करती हैं
ये हवाओ से तेरा ही जिक्र करती हैं ...


    स्नेहा कुवार्बी 





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