Rashi Saxena
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31/12/2019 | 12:16: PM
साहित्य खज़ाना / कविता | 196

दूरी यूं ही तो न आई होंगी


......दूरी यूं ही तो न आई होंगी......

सरेआम रुसवा करने की उसने
सरेआम रुसवा करने की उसने  
कोई तो वजह बताई होगी
...दूरी यूं ही तो न आई होंगी...
शिकायतें जो थीं तुमसे

शिकायतें जो थीं तुमसे
उसपर नाराज़गी तो जताई होगी
...दूरी यूं ही तो न आई होंगी...

आंसुओं का सैलाब जो उमड़ा था आँखों में
आंसुओं का सैलाब जो उमड़ा था आँखों में
उसने तुम्हारी भी आंखें भिगाई होंगी
...दूरी यूं ही तो न आई होंगी...

करके इतने यकीन भरे वादे
करके इतने यकीन भरे वादे
साथ जीने मरने की कसमें खाके
वादे न निभाने की कुछ तो वज़ह बताई होगी
...दूरी यूं ही तो न आई होंगी...

माना सारे गुनाह नाम थे हमारे
माना सारे गुनाह नाम थे हमारे
पर सज़ा तो उसने भी पाई होगी
...दूरी यूं ही तो न आई होंगी...

आज कहते हो, नफरत है हमसे
आज कहते हो, नफरत है हमसे
कभी तो हम में भी दिलचस्बी आई होगी
...दूरी यूं ही तो न आई होंगी...

टूटा होगा मेरा भी यकीन
टूटा होगा मेरा भी यकीन
यूंही तुमसे बाहें न छुड़ाई होंगी
...दूरी यूं ही तो न आई होंगी...

कहते थे हम अपनी रूह जिसे
कहते थे हम अपनी रूह जिसे
सोचा है
आज रोने की वज़ह उसे क्यों बनाई होगी
अरे जनाब

.....दूरी यूं ही तो न आई होंगी.....
......दूरी यूं ही तो न आई होंगी......

        


  राशि सक्सैना  



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